1857 की अनकही हैरत अंगेज़ दास्तानें (Hindi) 1857 ankahi hairat angez dastanein

Contents/ विषय-क्रम: भूमिका / 1857: स्वतंत्रता संग्राम के सच / अंग्रेज़ों ने दिल्ली कैसे जीती / 1857 के विद्रोह में महिलाओं की हिस्सेदारी / 1857 में हिंदू-मुसलमान-सिख एकजुटता / 1857 के ग़द्दार राजे-रजवाड़े जिन्होंने आज़ाद हिंदुस्तान में भी राज किया / 1857: अंग्रेज़ों द्वारा लूट के आंखों-देखे वृतान्त / दिल्ली की धन-दौलत / एक सैनिक कहावत / जीत के इनाम (लूट) की जगह / भत्ता / लूट जमा करने के लिए एजेंटों की नियुक्ति / शुरुआती लूट / अंतरात्मा की परीक्षा / लुभावना प्रदर्शन / सुनियोजित तलाशी / दौलत की एक खदान / लालच / एक शुभ विचार / छुपाने की पसंदीदा जगहें / मेरे साथ एक दुर्घटना / क़ीमती ख़ज़ाने की खोज / ख़ुशगवार यादें / लूट के सामान की बिक्री / लखनऊ की लूट / तस्वीरें
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26/11 की जांच — न्यायपालिका भी क्यों नाकाम रही? (डीवीडी के साथ) (Hindi)

26/11 ki jaanch — Nyay Palika Bhi Kyun Nakaam Rahi (with DVD):

There was quite a flutter in the country, especially in the camps of the IB and right-wing groups, when the author of this book, S.M. Mushrif, in his first book, Who Killed Karkare?, smashed the IB and Police theory of the 26/11 Mumbai terror attack case and offered a more convincing alternative theory. In this new book, he comes back to narrate as to how the IB, in order to prove its false theory, not only interfered in the investigations of the case at every stage, but also employed its tremendous clout and, with the help of a section of the media and the Police, successfully pulled it through the corridors of the courts and ultimately kicked it to its final destination, i.e., the gallows. The book also describes the shrewd moves on the part of the IB to scuttle all attempts to get the case reinvestigated. The author has expressed his serious concern over the unbridled powers being enjoyed by the IB, an extra-constitutional authority, to the extent of influencing almost all our constitutional institutions. However, he has ended the book on an optimistic note — pinning his hopes on the judiciary.”

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Ambedkar aur Hindutva Rajneeti (हिन्दी) (Hindi)

अम्बेडकर और हिंदुत्व राजनीति लेखक : राम पुनियान पुस्तक के बारे में : “अगर हिन्दू राज स्थापित हो जाता है

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Begunah Qaidi बेगुनाह क़ैदी (हिन्दी) (Hindi)

Aatankwaad ke jhootey muqaddmon mein phasaaye gaye Muslim nau jawanon ki daastaan बेगुनाह क़ैदी:  आतंकवाद के झूठे मुक़द्दमों में फंसाये

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Bharatiya Swatantrata Andolan Aur RSS (Hindi) भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और आरएसएस: Ek daastaan ghaddaari ki

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और आरएसएस: एक दास्तान ग़द्दारी की

कवर: स्वतंत्रता संग्राम के समय से चित्र।

 

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Gujarat Files (Hindi) गुजरात फ़ाइल्स लीपापोती का परदाफ़ाश

Hindi Edition of Gujarat Files:Anatomy of a Cover Up is a book about the 2002 Gujarat riots authored by journalist Rana Ayyub. The book is dedicated to Shahid Azmi along with advocate and activist Mukul Sinha.

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Watan mein paraya वतन में पराया: Hindustan ka Musalmaan (Hindi)

प्रस्तुत पुस्तक उनकी 2016 में प्रकाशित होने वाली अंग्रेज़ी पुस्तक Being the Other: The Muslim in India का अनुवाद है, जो संसार भर में प्रसिद्ध हुई। यह उनकी आत्मकथा भी है और उनके दौर की अतिमहत्वपूर्ण घटनाओं और राजनैतिक उथल-पुथल का इतिहास भी।

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आर एस एस  देश का सबसे बड़ा आतंकवादी संगठन (Hindi)

R.S.S.—Desh ka sabse bada Aatankwadi Sangathan एस. एम. मुशरिफ़ पूर्व आई जी पुलिस, महाराष्ट्र “इस पुस्तिका के लेखक एस एम

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आरएसएस को पहचानें (Hindi) RSS Ko Pehchaney

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दस्तावेज़ों पर आधारित

आरएसएस की वफ़ादारी! किसके प्रति? / राष्ट्रीय-ध्वज से नफ़रत / संविधान का तिरस्कार / संघीय ढाँचे से घृणा / प्रजातंत्र के दुश्मन / आरएसएस की भागीदारी! स्वतंत्रता संग्राम में…? / श्यामा प्रसाद मुखर्जीः हिन्दुत्व के आदर्श प्रतीक जिन्होंने मुस्लिम लीग और ब्रिटिश शासकों का साथ दिया / हिन्दुत्ववादी टोली ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस की पीठ में छुरा घोंपा / आरएसएस का आदरभाव! शहीदों के प्रति…? / आरएसएस पर प्रतिबन्ध! गांधीजी की हत्या के बाद? / आरएसएस…सांस्कृतिक संगठन! इतना बड़ा झूठ…? / एक स्वतंत्र राजनैतिक दल भाजपा…? / आरएसएस और षड्यंत्र एक ही सिक्के के दो पहलू हैं / आरएसएस किसका पक्षधर? हिटलर का? देशविरोधी संगठनों का…? / गोलवलकर के अनुसार मुसलमान नागरिक ख़तरा नम्बर  1 / गोलवलकर के अनुसार ईसाई नागरिक ख़तरा नम्बर 2 / आरएसएस की सोच! इतनी अमानवीय…? / शूद्रों (दलितों) के संबंध में मनु के क़ानून / महिलाओं के संबंध में मनु के क़ानून / आरएसएस का राष्ट्र! द्विराष्ट्रीय सिद्धांत पर आधारित…? / गाय और आरएसएस – बेलगाम झूठ
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करकरे के हत्यारे कौन? भारत में आतंकवाद का असली चेहरा (Hindi)

राज्य और राज्यविहीन तत्त्वों द्वारा राजनीतिक हिंसा या आतंकवाद का एक लम्‍बा इतिहास भारत में रहा है। इस आरोप ने कि भारतीय मुसलमान आतंकवाद में लिप्त हैं, 1990 के दशक के मध्य में हिंदुत्ववादी शक्‍तियों के उभार के साथ ज़ोर पकड़ा और केंद्र में भाजपा की सत्ता के ज़माने में राज्य की विचारधारा बन गया। यहाँ तक कि “सेक्यूलर” मीडिया ने सुरक्षा एजेंसियों के स्टेनोग्राफ़र की भूमिका अपना ली और मुसलमानों के आतंकवादी होने का विचार एक स्वीकृत तथ्य बन गया | हद यह कि बहुत-से मुसलमान भी इस झूठे प्रोपेगण्डे पर विश्‍वास करने लगे। पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी एस.एम. मुशरिफ़ ने, जिन्होंने तेलगी घोटाले का भंडाफोड़ किया था, इस प्रचार-परदे के पीछे नज़र डाली है, और इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र व अपने लम्बे पुलिस अनुभव से प्राप्त ज़्यादातर जानकारियों (शोध-सामग्री) का उपयोग किया है। उन्होंने कुछ चौंकाने वाले तथ्यों को उजागर किया है, और अपनी तरह का पहला उनका यह विश्‍लेषण तथाकथित “इस्लामी आतंकवाद” के पीछे वास्तविक तत्त्वों को बेनक़ाब करता है। ये वही शक्‍तियां हैं जिन्होंने महाराष्ट्र ए टी एस के प्रमुख हेमंत करकरे की हत्या की, जिसने उन्हें बेनक़ाब करने का साहस किया और अपनी हिम्मत व सत्य के लिए प्रतिबद्धता की क़ीमत अपनी जान देकर चुकाई। यह पुस्तक भारत में “इस्लामी आतंकवाद” से जोड़ी गयीं कुछ बड़ी घटनाओं पर एक कड़ी नज़र डालती है और उन्हें आधारहीन पाती है।

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क़ैदी नम्बर 100: कारागार के दिन-रात

भारतीय यातना घरों में बीते अत्यन्त कष्टदायी क्षणों के बारे में लिखना मेरे लिए आसान नहीं था। हर पल जब भी क़लम हाथ में लेकर लिखने बैठती तो जेल के अंधकारमय जीवन के कष्टदायी दृश्यों के होश उड़ा देने वाले चिह्‌न मेरे दिमाग़ में ताज़ा हो कर मुझे फिर से बेचैन कर देते और मैं बहुत ज़्‍यादा मानसिक तनाव में आ जाती। बड़ी देर तक उसी हालत में पड़ी रहती। बहुत मुश्किल से फिर से लिखना शुरू करती, मगर रक्त रंजित यादों की भीड़ फिर से प्रकट हो जाती और मैं दोबारा मानसिक तनाव से घिर जाती। यह सिलसिला किताब लिखने के पूरे काम के दौरान चलता रहा।

रिहाई के बाद से अनिद्रा की बीमारी से ग्रस्त हूं। नींद की दवा खाए बिना सो नहीं सकती हूं। रात-रात भर जागती रहती हूं। घुटन भरे सपने मुझे अब भी आते हैं। सपने में जेल, जेल की सलाखें, जेल के स्‍टाफ़ और वहां का तनावपूर्ण माहौल देखती हूं। अभी भी जब शाम को छः बजता है तो एक भय सा छा जाता है। छः बजे के बाद घर से बाहर निकलना अजीब सा लगता है, क्योंकि जेल में छः बजे गिनती बंद हो जाती थी और उस आदत ने मेरे दिमाग़ को क़ैद कर दिया है। वैसे तो अब आज़ाद दुनिया में हूं, लेकिन अभी भी बिना हाथ पकड़े मैं सड़क पर आसानी से नहीं चल सकती हूं, क्योंकि पांच साल तक पुलिस वाले मेरा हाथ पकड़ कर तिहाड़ जेल से अदालत और अदालत से तिहाड़ जेल तक ले जाया करते थे। इस आदत ने मेरे दिमाग़ पर वे निशान छोड़े हैं जिनका मिटना मुश्किल है।

—इस किताब का एक अंश / अंजुम ज़मुर्रद हबीब

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गुजरात — पर्दे के पीछे Gujarat – Pardey Ke Peechhey (Hindi)

गोधरा रेलवे स्टेशन की दुर्घटना के बाद गुजरात के अनेक इलाक़ों में भड़कने वाले भीषण दंगे गुजरात तथा भारत के चेहरे पर कलंक हैं । इन भीषण दंगों का कारण पुलिस द्वारा क़ानून-व्यवस्था का पालन न करना था । इस पुस्तक में लेखक ने घटनास्थल पर उपस्थित एक उच्च पुलिस अधिकारी की हैसियत से दंगों और बाद में उन्हें छिपाने तथा अपराधियों को बचाने की सुसंगठित सरकारी कोशिशों का पर्दाफ़ाश किया है । दंगों के दौरान उनकी रिपोर्टें और बाद में दंगों की जाँच करने वाले जाँच आयोग के सामने उनके बयान राजनेताओं, पुलिस तथा नौकरशाहों की घिनौनी भूमिका का पर्दाफ़ाश करते हैं । उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित विशेष जाँच दल (एस.आई.टी.) के कार्य को उन्होंने निकट से देखा और इस निष्कर्ष तक पहुँचे कि एस.आई.टी. ने अपराधियों को उनके कुकृत्यों का दण्ड दिलाने के बजाय उनको बचाने वाले वकील के तौर पर काम किया । गुजरात के दंगे और बाद की परिस्थितियों के चश्मदीद गवाह ने यह पुस्तक अपनी अन्तरात्मा के बोझ को हल्का करने के लिए लिखी है । The anti-Sikh riots in 1984 and violence in Gujarat, after killing of 59 Ram Bhaktas in Godhra Railway Station, in 2002, and subsequent subversion of Criminal Justice System in Gujarat State, had inflicted infamy on the image of Indian State and its commitment to the Rule of Law. Unlike terrorist attacks and explosions, no communal riots can prolong unless the authorities avoid implementation of Standard Operating Procedure (SOP), to control and contain mass violence and normalize public order. High Voltage mass violence was reported from 11 of 30 police administrative units of Gujarat. Significantly, volume of crime was directly proportionate to the commitment of law enforcers in police and Executive Magistracy, to implement SOP, ignoring extra-legal pressures from unauthorized quarters. The book uncovers the author s experience as a senior police officer and citizen about background, course and aftermath of 2002 communal holocaust. The author provides substantial sound evidence on planners and perpetrators of violence. Basing on his situation assessment reports, the Central Election Commission, in August 2002, had refused to accept the State Assembly Election Schedule proposed by the State Government, after premature dissolution of the Assembly. Instances of complacency of the Judicial Commission by not probing deeply into inputs on the omissions and commissions of government officials and political bureaucracy are delineated. The Special Investigation Team (SIT), constituted by the Supreme Court, had practically transformed into a team of defence lawyers of the planners, organizers and enablers of violence, by booking only foot soldiers of communal crimes, the author lamented. He throws light on the soul-less secularism of the Indian National Congress, betraying opportunistic communalism, by appeasement of minority and majority communalism simultaneously. How the government failed to practice Raj Dharma , both as per the ideals of Indian heritage and provisions of the Constitution of India is explained. The imperativeness of providing statutory frame-work to the concepts of command responsibility and accountability of supervisory cadre in the government, is projected as the vital lesson to be learnt for forestalling repetition of mass crimes in future.

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भारत-विभाजन विरोधी मुसलमान (Hindi) Bharat-Vibhajan Virodhi Musalmaan

डॉ॰ शम्सुल इस्लाम ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सबसे अधिक उपेक्षित किये गए अध्याय पर क़लम उठाया है,

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रामजन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद: मिथक एवं तथ् (Hindi)

अंग्रेज़ों ने फूट डालो और राज करो की रणनीति के तहत ऐसे विकृत इतिहास को परोसा, जिससे यहाँ के लोग मिल-जुल कर न रहने पायें। वे यहाँ से अपना आसन लेकर चले गये, परन्तु अपने गुर्गों को यहीं छोड़ गये। उनके गुर्गे आज भी अपने उस्ताद की नीतियों का अनुसरण करते हुए नया विकृत इतिहास रच रहे हैं, जिसका तथ्यों से कोई ताल्‍लुक़ नहीं है। यह विकृत एवं मनगढ़ंत इतिहास लोगों को भ्रम की स्थिति में छोड़ने में कामयाब रहा है। यह इतिहास यदि रचा नहीं गया होता तो शायद महात्मा गाँधी की हत्या नहीं होती, बाबरी मस्जिद नहीं तोड़ी जाती, गोधरा काण्ड के पश्‍चात गुजरात में मुस्लिम-संहार नहीं होता। इसके अलावा भी भारत में तमाम दंगे हुए जिसमें मानवता को भारी क्षति पहुँची है, उससे बचा जा सकता था। हिन्दू धर्म को ख़तरा हिन्दू, मुस्लिम, क्रिश्‍चियन, बौद्ध या अन्य किसी धर्म, मज़हब से नहीं है। इसे ख़तरा सिर्फ़ हिन्दू धर्म के साम्प्रदायिक गिरोहों से है। ये गिरोह धर्मान्ध हैं। धर्मान्धता अपने ही धर्म की अच्‍छाइयों को समझने नहीं देती। जो आस्था दूसरे मज़हबों के प्रति नफ़रत पैदा करे, जिससे देश की एकता और अखण्डता को ख़तरा हो, जो इन्सानियत पर कुठाराघात करे, वह आस्था न होकर आतंकवाद है, उत्पीड़न है, हैवानियत है। साम्प्रदायिक ताक़तें आस्था के नाम पर लोगों को हैवानियत की ओर ढकेलने को उतावली हैं। इस पुस्तिका का उद्‌देश्य है इतिहास के सही तथ्यों को समाज के समक्ष रखकर साम्प्रदायिक ताक़तों के कारनामों का पर्दाफ़ाश करना, जिससे देश में प्रेम, मुहब्बत, भाईचारा, समता, ममता, बन्धुता और एकता को बढ़ावा मिल सके।

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संघी आतंकवाद Sanghi Aatankvaad (Hindi)

हमारा देश भारत अपनी गंगा-जमुनी संस्कृति एवं साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए प्रसिद्ध रहा है, परन्तु कुछ असामाजिक तत्त्व इसकी इस विशेषता को समाप्त कर यहां के वातावरण में नफ़रत और साम्प्रदायिकता का ज़हर घोलने का प्रयास भारत-विभाजन के पहले ही से करते रहे हैं और आज उनकी ये कोशिशें अपने चरम पर हैं। प्रस्तुत पुस्तक ‘संघी आतंकवाद’ के लेखक युगल किशोर शरण शास्त्री चूँकि स्वयं भी एक लम्बे समय तक संघ-प्रचारक रह चुके हैं, इसलिए उन्होंने संघ की इस वैमनस्यपूर्ण तथा विघटनकारी मानसिकता को बहुत क़रीब से जाना और पूरी निर्भीकता के साथ, मुखर रूप से अपनी इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही उन्होंने इन असामाजिक तत्त्वों द्वारा इस्लाम के बारे में फैलायी जा रही ग़लतफ़हमियों को भी दूर करने का प्रयास किया है। यह पुस्तक संघी आतंकवाद की मानसिकता को समझने तथा उसके बारे में लेखक के मुखर एवं स्पष्टवादी विचारों को जानने के लिए अवश्य पढ़ी जा सकती है।

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सावरकर–हिन्दुत्व मिथक और सच Savarkar-Hindutva: Mithak aur Sach (Hindi)

प्रस्तावना : डॉ. डी.आर. गोयल / प्रथम संस्करण की भूमिका / मिथक–एक: सावरकर महान स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने ब्रिटिश शासकों से कभी सहयोग नहीं किया / मिथक–दो : सावरकर का अधिकांश जीवन सेलुलर जेल में बीता मिथक–तीन सावरकर की माफ़ी की अर्ज़ियाँ रिहाई पाने की एक चाल थी, ताकि वे मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए सक्रियता से काम कर सकें / मिथक–चार: सावरकर मुस्लिम लीग और उसकी सांप्रदायिक नीति के ख़िलाफ़ दीवार बनकर खड़े रहे / मिथक–पांच: सावरकर तर्कवादी, वैज्ञानिक सोच के पक्षधर थे और छुआछूत के ख़िलाफ़ उन्होंने संघर्ष किया / मिथक–छः: गांधी हत्याकांड में सावरकर के ख़िलाफ़ आरोप कभी सिद्ध नहीं हुए / मिथक–सात : सावरकर का हिंदुत्व भारतीय राष्ट्रवाद को वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है / तस्वीरें
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